हनुमान जी ने पार की सभी बाधाएं

नई दिल्ली/अरविंद कुमार यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिव्य धाम आश्रम, दिल्ली में मासिक भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य एवं शिष्याओं ने आए हुए भक्तों के समक्ष आध्यात्मिक विचार रखें। साध्वी जी ने कहा कि एक गुरू ही है, जो एक भक्त के जीवन में अंधकार न देखते हुए उसे प्रकाश की ओर अग्रसर करता है। उसकी मंद बुद्धि को समाप्त कर उसे सद्बुद्धि प्रदान करने वाला एक गुरू ही है। ऐसे गुरू के स्मरण मात्र से ही दुख, दरिद्र, क्लेश व डर इत्यादि सभी मुश्किलें खत्म हो जाती है, लेकिन आज संसार में हम देखें कि आप को सभी परमात्मा के भक्त ही दिखाई देंगे लेकिन सोचने वाले बात यह है कि उनके जीवन में जो होना चाहिए वह नहीं है, और जो नहीं होना चाहिए, वह उनके जीवन में है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान प्रभु की भक्ति तो कर रहा है उस भक्ति के रास्ते पर चल नहीं रहा है। जिस पर चल कर उस जगत के पालक के दीदार हो सके। और उसके जीवन में परिवर्तन आ सके। क्योंकि आज के इंसान ने परमात्मा को केवल मात्र मानने तक ही सीमित कर रखा है, लेकिन प्रभु प्रकाश रूप में इस संसार में रमण करते है। उस प्रकाश रूप को इन बाहरी नेत्रों के द्वारा नहीं देखा जा सकता। इंसान को मानने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे कण-कण में विचरण करने वाले प्रभु को अपने घट में प्रकाश रूप में देखने के लिए भी अग्रसर होना होगा। इस मासिक आध्यात्मिक समागम पर साध्वी जी ने श्रीरामचरित मानस का उदाहरण लेते हुए समझाया कि जैसे एक नदी अपनी सारी बाधाओं को पार करती हुई आगे निकल जाती है। ऐसी ही बाधाओं को पार किया भक्त हनुमान जी ने। जब वह श्रीराम जी की आज्ञानुसार अंगद, जामवंत, नल व नील को साथ लेकर माता सीता की खोज में लंका की ओर प्रस्थान करते है। उनके मार्ग में अगर कोई राक्षस आता तो उसे मार गिराते। अगर उनके मार्ग में कोई मुनि आता तो उन्हें घेरकर उनसे माता सीता का पता पूछने लगते और कहते कि उन तक कैसे पहुंचा जाए? निस्संदेह आत्मा के उत्थान के लिए जब एक जीव निकलता है तब उसे दुष्प्रवृत्तियों रूपी राक्षस को मार गिराना चाहिए और जब कोई संत मिले तो उनसे आगे का मार्गदर्शन ले लेना चाहिए। लेकिन जो भक्त की डगर है, वह बड़ी विचित्र है। इस डगर पर जब कोई भक्त अपने पुरूषार्थ के बल चलता है तो वह उस शक्ति का अनुभव नहीं कर पाता जो शक्ति उसे चला रही है। जब कोई भक्त इस डगर पर उस गुरू रूपी शक्ति को समर्पित होकर चलता है तो उसे हर पल यह अहसास होता रहता है कि उसके गुरू के दिव्य हस्त कमल सदैव ही उसके सर पर छाया की तरह है और उसका मार्गदर्शन कर रहे है।

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