प्रभु श्री राम ने बनवास जा कर मर्यादा में रहने का दिया सन्देश: साध्वी श्रेया भारती जी

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्री राम कथा का पंचम् दिवसद्ध
नई दिल्ली/नगर संवाददाताः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा ‘सिहस्ंथ महाकुंभ, उज्जैन’ मे सात दिवसीय श्री राम कथा के पंचम् दिवस में सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या महामनस्विनी मानसमर्मज्ञा साध्वी सुश्री श्रेया भारती जी ने बताया कि जब प्रभु पंचवटी में निवास करते है तो वहां पर प्रभु श्री राम जी के दिव्य स्वरूप को देखकर शूर्पनखा का मोहित हो जाती है और वह प्रभु राम के समक्ष प्रणय निवेदन रखती है परंतु प्रभु उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं तो वो राक्षसी मां सीता का भक्षण करने के लिये उनकी ओर दौड़ पड़ती है। तभी महाबली राम जी ने मौत के पफंदे की तरह आती हुई उस राक्षसी को हुंकार से कुपित हो लखन से कहा कि लखन इस उदंड राक्षसी को इसके कर्म का पफल दे दो राम जी के इशारे से ही लखन ने अपनी म्यान से तलवार खींची और शूर्पनखा के कान नाक को काट दिया। इस प्र्रसंग को सुनकर बहुत से लोग प्रभु पर और लखन पर आक्षेप लगाते है कि प्रभु तो मर्यादापुरुषोत्तम थे। उन्होंने ऐसे कर्म को करते हुए लखन को रोका क्यूं नहीं। भगवान वाल्मीकि जी बताते है कि जब राम वन को जाने के लिए उद्यत हुए तो मां सुमित्रा ने लखन को समझाते हुए कहा राम दशरथ हे लक्षमण! आज से तुम राम को पिता दशरथ सदृश समझना। जनकात्मजा जानकी को माता के समान मानना। तात्पर्य कि लखन जानकी को मां कहते और पूजते थे। अब बताइए यदि कोई हमारे सामने हमारी मां को मारने के लिए दौड़े तो क्या आप चुप चाप बैठे रहेंगें। नही! आपका रक्त खौलेगा आप प्रतिक्रिया स्वरूप उस अभद्र व्यक्ति को अवश्य दंडित करोगे। शूर्पनखा भी लखन के सामने जानकी पर टूट पड़ी थी पिफर लखन निष्क्रिय कैसे रह सकते थे। उनका नाक कान काटना बिल्कुल र्ध्मसयुक्त और न्याय संगत था। आगे ‘सीता-हरण’ प्रसंग का व्याख्यान करते हुए बताया कि रावण भगवे वस्त्रा धरण कर कुटिया के समक्ष आकर अलख जगात है तब मां जानकी रावण को संत समझकर उनको भिखा देने के लिए लक्ष्मण रेखा का भी पार आती है तभी रावण जानकी जी का हरण कर लेता है। साध्वी जी ने बताया कि संत की पहचान उसका पहरावा या शैली नहीं है। आज के परिवेश में संतो का अकाल नहीं है। हर जगह गैरिक रंग के वस्त्रा पहने आपको संत दिख जायेगे। पर यहां स्वाल है कि हर भगवाधरी को गुरु कहना क्या उचित है? नही! गुरु की पहचान क्या है इसके विषय में हमारे महापुरुषों ने बताया है कि जो ईश्वर दिखा दे वही गुरु है। इसी कसौटी को हाथ में लेकर चलना है पिफर हम कभी धोखा नही खाएंगे। उन्होने बताया कि प्रेम की पराकाष्ठा प्राप्त कर चुकी शबरी के आश्रम में जाकर उसके जूठे बेर प्रभु ने खाये। प्रभु श्री राम भक्ति सेे परिपूर्ण आंतरिक सौन्दर्य को देखकर उसे ‘भामिनी’ कह कर संबोधित करते है।

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