परमात्मा मानने का नहीं अपितु देखने का विषय- साध्वी श्रेया भारती जी

परमात्मा मानने का नहीं अपितु देखने का विषय- साध्वी श्रेया भारती जी

नई दिल्ली/अरविंद यादवः दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के द्वारा ‘सिहस्ंथ महाकुंभ, उज्जैन’ मे सात दिवसीय श्री राम कथा के चतुर्थ दिवस मे सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या महामनस्विनी मानसमर्मज्ञा सुश्री श्रेया भारती जी ने प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त केवट का चित्राण इस प्रकार किया कि उपस्थित जनसमूह भाव विभोर हो उठा। उन्होंंने बताया कि प्रभु श्रीराम केवट के पास जाकर उससे नौका की माँग करते हैं। केवट बिना किसी परिचय केे ही प्रभु श्रीराम कोेे पहचान जाता हैै क्योेंकि केेवट के पास वह दिव्य दृष्टि थी। उसकेे पास संतो के द्वारा प्रदत्त ब्रह्म ज्ञान था जिससे प्रभु केे वास्तविक स्वरुप का बोध् हो जाता है। साध्वी जी ने बताया कि परमात्मा तो देखने का विषय है उसे पहले देखा जाता है और पिफर ही उसकेे बारे मे व्याख्यान किया जा सकता है। लेकिन हम ईश्वर को बाहरी चर्म चक्षुओं से ढूंढते हैं या देखने का प्रयास करते हैं परन्तु इन आँखों से संसार कोे भी पूरी तरह से समझ नहीं पाते तो वह परमात्मा इन आंखों से केसै देखा जा सकता है? वह तो इंद्रियातीत है, उसे आप देख एवं जान सकते हो दिव्य दृष्टि के माध्यम से। आज लोग ध्न, विद्वता या बल के आधर पर प्रभु को करना चाहते है जो की रेत में से तेल निकालने वाली बात है। प्रभु तो प्रेम की रज्जु से बंध्ते हैं। प्रेम के वशीभूत होकर ही तो प्रभु श्रीराम गरीब, अनपढ़ और निर्बल केवट के पास खिंचे चले आये। केवट अपने विवेक और बुद्वि से प्रभु के चरण पखारता है और प्रभु को अपनी नौैका में बिठा कर गंगा पार ले जाता है।
आगे प्रसंग का व्याख्यान करते हुए सुश्री श्रेया भारती ने बताया कि भरत जी को राज्य का लोभ नहीं था और न ही प्रभु श्री राम जी को राज्य का लोभ था। भक्त और भगवान का यह चरित्रा हमें कुछ समझाना चाहता है कि यदि हम समाज का उत्थान करना चाहते है तो हमें केवल उनके चरणों में नतमस्तक ही नही होना है बल्कि उनके गुणां को भी अपने जीवन में धरण करना है। तभी स्वस्थ भारत का निर्माण हो पायेगा उससे पहले नही। भरत जी ने माता कैकेयी के द्वारा अनुचित ढंग से प्राप्त किए गए राज्य को अस्वीकार कर दिया। लेकिन आज अनुचित ढंग से संग्रह करने की प्रवृति का बोलबाला है। यही कारण है कि आज भ्रष्टाचार हर तबके के सत्य का निगलता चला जा रहा हैं। घोटालो की जो सुनामी बड़ी तेजी से जो भारत में आयी है उससे पूरा भारत डूबा पड़ा है। राजा होते हुए भी श्री राम जी ने प्रजा के हितों के लिए पल-पल अपने निजी सुखों का त्याग किया। दूसरे तरपफ आज के राजनेता हैं जो अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक प्रजा का शोषण कर उनका खून चूस सकते हैं। श्री राम जी के जीवन आदर्शों को अपने जीवन में धरण न करने के कारण ही आज हमारा राजनीतिक तन्त्रा बुरी तरह भ्रष्ट हो चुका है। बड़़े अपफसोस से कहना पड़ रहा है कि आज देश का रक्षक ही भक्षक बन बैठा है। पिफर न्याय की गुहार कहाँ लगाई जाए? अगर देश का राजा ही भ्रष्ट हो जाए पिफर देश को बर्बाद होने से कौन बचा सकता है? इसलिए साफ-सुथरे राज तन्त्रा की स्थापना हेतु श्री राम जी का चरित्रा एक आदर्श राजा के गुणों को हमारे सामने रखता है।

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