समाज को वैचारिक क्रांति की आवश्यकता- साध्वी श्रेया भारती जी

समाज को वैचारिक क्रांति की आवश्यकता- साध्वी श्रेया भारती जी

नई दिल्ली/अरविंद यादवः श्री राम राज्य गौशाला के पीछे उजड़खेड़ा-1, बड़नगर रोड, उज्जैन में दिनांक 12 से 18 मई, 2016 तक श्री राम कथा ज्ञान यज्ञ का भव्य व विशाल आयोजन किया जा रहा है। जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की परम शिष्या मानस मर्मज्ञा महामनस्विनी सुश्री श्रेया भारती जी ने प्रथम दिवस में समस्त धार्मिक ग्रंथों के समन्वय से प्रभु के जन्म एवं उनके जीवन की लीलाओं के भीतर छिपे हुए आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हुए राम जन्म प्रसंग किया। जो केवल मात्र प्रभु की जन्म गाथा व ग्रंथों की चैपाइयों का सरसपूर्ण गायन नहीं वरन एक विश्लेषणात्मक अध्यात्मिक अध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण प्रभु के अवतरण व प्राकट्य के दिव्य रहस्यों को परिलक्षित करता प्रसंग है। सुश्री भारती जी ने राम कथा के मर्म और श्री राम जी के चरित्र की मनुष्य के जीवन के लिए महानता बताते हुए कहा कि राम जी का चरित्र समाज, धर्म, राजनीति, अर्थ एवं कानून व्यवस्था इत्यादि सभी पक्षों के लिए आदर्श एवं शिक्षाप्रद है जो कि कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर होने के लिए दृढ़ करता है। अध्यात्म का वास्तविक अर्थ भी इसी चरित्र के मुखारविंद से निकली अलौकि रसधार से मिलता है तो वह है राम कथा। सुश्री श्रेया भारती जी ने बताया कि जैसे राजा दशरथ जी ने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ किया जिसके लिए यह समझा जाता है कि वह पुत्र की कामना के लिए किया गया। लेकिन इस सोच में मानव का अल्पज्ञान झलकता है। अगर हम संस्कृत भाषा के कोश को उठाकर देखे तो पुत्र शब्द का प्रथम अर्थ होता है संतति इसका अर्थ होता है जन्म दिया गया। जिसे जन्म दिया जाए वो बालक बालिका दोनों में से कोई भी हो सकता है। पुत्र शब्द सुनते ही हम उस संतान को सोचते हैं जो बालक है। जो वंशवृद्धि करे राज काज चलाए। आज सही अथा को न जाने के कारण पुत्र कामना तो बहुत करते हैं परंतु इसके साथ घिनौना अपराध भी कर रहे है। बालिकाओं को कोख में कत्ल कर देना। वर्तमान दौर में कन्या भ्रूण हत्या सामाजिक जीवन के लिए एक बड़ी व्याधि बन कर खड़ी हो गई है। समाज का एक बड़ा शिक्षित वर्ग भी इस बुराई का हिस्सा बना हुआ है। यदि इसी प्रकार स्त्री पुरूष के अनुपात में अंतर आता रहा तो अनेकों कुरीतियां व्यभिचार बहुपत्नीवाद व वेश्यावृति के रूप में बढ़ेंगी। जिस प्रकार अंधकार को दूर करने के लिए हमें स्वयं प्रकाश बनना होगा। नारी तो स्वयं संवेदना की प्रतिमूर्ति होती है। और जिसमें संवेदना ही नहीं वह नारी नहीं अपितु पशु है। पशु नारी कभी समाज के उत्थान में योगदान नहीं दे सकती। कन्या भ्रूण हत्या की कुरीति को मिटाने में बाहरी प्रयास असफल सिद्ध हो रहे है। आज वर्तमान समाज को ऐसी वैचारिक क्रांति की जरूरत है जो मन के क्षेत्र में मंथन की प्रक्रिया पैदा कर दें। जिसका आधार मात्र ब्रह्मज्ञान का भाव वह ज्ञान जिसके द्वारा मानव अपने घट में ही ईश्वर के दर्शन करता है और यह ज्ञान पूर्ण गुरू की कृपा से ही मानव प्राप्त करता है। गुरू का भाव ही यह है कि जो हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर परमात्मा के दिव्य प्रकाश में ले जाने की कला में निष्णता हो।

Share This Post

Post Comment